Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 123, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । ज्ञस्य कस्मिंश्चिदेवांशे भवत्यतिशयेन धीः । नित्यतृप्तः प्रशान्तात्मा स आत्मन्येव तिष्ठति ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

उस जीवन्मुक्त पुरुष में अन्य सिद्धो द्वारा अनुभूत न होनेवाला निरतिशयानन्द अनुभव ही विशेष है, इस आशय से उत्तर देते हैं। जीवन्मुक्त ब्रह्मज्ञानी पुरुष की बुद्धि अन्य सिद्धो के अगम्य विषय में (परमात्मतत्त्वांश में ही) दृढ़रूप से जम जाती हे, यही कारण है कि नित्यतृप्त शान्तचित्त होकर वह अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है ओर कुछ नहीं चाहता