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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 123, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

मन्त्रसिद्धैस्तपःसिद्धैस्तन्त्रसिद्धैश्च भूरिशः । कृतमाकाशयानादि का तत्र स्यादपूर्वता ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

मन्त्रसिद्धि आदि से सिद्ध हुए पुरुषों के रूप से भी मैं ही अवस्थित हूँ, इस तरह की सर्वात्मबुद्धि होने के कारण उन सिद्धो द्वारा प्राप्त आकाशगमन आदि सिद्धियों की भी ज्ञानी ने प्राप्ति कर ही ली है, इसलिए उन सिद्धियों में उसे कुछ भी अपूर्वता प्रतीत नहीं होती, यह कहते हैं। मन्त्र की सिद्धि से, तप की सिद्धि से एवं तन्त्र की सिद्ध से युक्त सिद्धों के द्वारा प्राप्त की गयी जो नानाविध आकाशगमन आदि सिद्धिर्यौ हैं उनमें सर्वात्मभाव रखनेवाले ज्ञानी के लिए कौन-सी अपूर्व बात है ?