Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 124, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
किंचिद्यद्रोचते तुभ्यं तद्बद्धोऽसि भवस्थितौ ।
न किंचिद्रोचते चित्ते तन्मुक्तोऽसि भवस्थितौ ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
राग ओर विराग का अलग-अलग स्वरूप बतलाते हुए उनसे क्रमश: बन्ध और मोक्ष होता है, यह
बतलाते हैं।
हे श्रीरामजी, इस संसार स्थिति में यदि आपको कोई चीज अच्छी लगती है, तो आप बद्ध हैं और
यदि आपको अपने चित्त में कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती है, तो आप मुक्त हैं, यह जान लीजिये