Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 124, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

जीवस्य त्रीणि रूपाणि स्थूलसूक्ष्मपराणि च । तत्रास्य यत्परं रूपं तद्भज द्वे परित्यज ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव तो मन से वेष्टित रहता है, उसमें से कितना अंश अलग करके मन से काट देना चाहिए, यह बतलाने के लिए जीव के स्वरूपों का विभाग करते हैं। जीव के तीन रूप हैं - एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म और तीसरा पर | उनमें से इसका तीसरा जो पररूप है उसका तो आप आश्रय कीजिये और बाकी बचे दो रूपों को मन से काट दीजिये