Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verses 22–24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 124, verses 22–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु स्थितं त्रिष्वप्यलक्षितम् ।
तुर्यं ब्रूहि विशेषेण विविच्य मुनिनायक ॥ २२ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अहंभावानहंभावौ त्यक्त्वा सदसती तथा ।
यदसक्तं समं स्वच्छं स्थितं तत्तुर्यमुच्यते ॥ २३ ॥
या स्वच्छा समता शान्ता जीवन्मुक्तव्यवस्थितिः ।
साक्ष्यवस्था व्यवहृतौ सा तुर्यकलनोच्यते ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जग्रत् ओर स्वप्न में जीव के स्थूल ओर सूक्ष्म दो रूप प्रसिद्ध है ही । उनका परित्याग कर देने पर
भी तो जीव की भलीभाँति परिशुद्धि नहीं हो सकती, इसलिए जाग्रत्. स्वप्न ओर सुषुप्ति - इन तीनों
अवस्थाओ से परे की जिज्ञासा करते हुए श्रीरामजी पूछते हैं।
हे मुनिनायक, जाग्रत्, स्वप्न ओर सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं मेँ स्थित (संकीर्ण) अतएव
स्पष्टरूप से न देखा गया जो तुर्यरूप है उसे विशेषरूप से खूब अच्छी तरह विचार करके कहिये ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे रामभद्र, अहंभाव तथा सत् ओर असत् का त्याग करके जो आसक्त,
सम ओर स्वच्छ स्वरूप स्थित रहता है वही तुर्यरूप हे । जीवन्मुक्तो मे जिसकी अन्तिम स्थिति हे,
जो स्वच्छ, समरूप ओर शान्त है, जो व्यवहारकाल में “साक्षी की अवस्था" प्रसिद्ध है वही तुर्यावस्था
कही जाती हे