Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 124, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
नैतज्जाग्रन्न च स्वप्नं संकल्पानामसंभवात् ।
सुषुप्तभावो नाप्येतदभावाज्जडता स्थितेः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत् आदि अवस्थाओं से उसके साकर्य का निवारण करते है।
संकल्पो का अभाव रहने से यह अवस्था न जाग्रत् है, न स्वप्न हे ओर अज्ञान का अभाव रहने से
यह न सुषुप्ति ही है