Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 124, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
निर्विकल्पा हि चित्तुर्यं तदेवास्तीह नेतरत् ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्यं त्रयं रूपं हि चेतसः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
क्योकि जाग्रत्, स्वप्न ओर
सुषुप्ति - ये तीनों चित्त के रूप हे । (रज आदि गुणों की प्रधानता से तीन विभाग करके तीन अवस्थाओं
को दशति हैं) घोर, शान्त ओर मूढ - यों तीन रूप से अपना चित्त यहाँ पर अवस्थित है