Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 124, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
घोरं शान्तं च मूढं च आत्मचित्तमिहास्थितम् ।
घोरं जाग्रन्मयं चित्तं शान्तं स्वप्नमयं स्थितम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत्
अवस्था का चित्त घोर है, स्वप्न-अवस्था का चित्त शान्त है ओर सुषुप्त भाव में स्थित हे मूढ़ चित्त। रज
आदि तीन गुणोवाली माया का उच्छेद हो जाने पर इन तीनों से हीन हुआ चित्त मृत है