Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 125, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 125, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
दृष्टा रम्यमरम्यं वा स्थेयं पाषाणवत्समम् ।
एतावतात्मयत्नेन जिता भवति संसृतिः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रिय ओर अप्रिय का अनुसन्धान न करके यह जो कहा है, उसीको स्पष्ट करते हैं।
रम्य या अरम्य वस्तु को देखकर पत्थर के समान समभाव में स्थित रहना चाहिए। बस, इतने ही
अपने यत्न से यह संसार जीत लिया जाता है