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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 125, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 125, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

संवेदनीयं न सुखं नासुखं न च मध्यमम् । एतावतात्मयत्नेन दुःखान्तोऽनन्त आप्यते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

सुख-दुःख और इन दोनों के साधनों की (संसार- सागर को पार कर जाने की इच्छा रखनेवाले प्राणी को) कभी भी चिन्ता न करनी चाहिए। बस, इतने ही अपने यत्न से अनन्त सुख प्राप्त होता है