Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 125, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 125, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
आपीनमण्डलशशाङ्कवदन्तरेव श्रीमद्रसायनमयः सुखमेति तज्ज्ञः ।
विज्ञातसर्वभुवनत्रयवस्तुसारः कुर्वन्न नाम कुरुते परमभ्युपेतः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जिसने तीनों लोकों की सभी वस्तुओं के सारका ज्ञान
कर लिया है अतएव जो चारों ओर स्वतः फैले हुए प्रकाश से शोभायमान निरतिशय सुखस्वरूप तथा
अमृतमय बन गया है, अतएव जो खूब परिपुष्ट हुए मण्डलवाले शशांक के यानी पूर्णचन्द्र के सदृश हो
गया हे, ऐसा परमात्मस्वरूप को प्राप्त हुआ तत्त्वज्ञ अपने अन्दर जीवन्मुक्ति सुख को प्राप्त करता हे ।
प्रारब्धप्राप्त कार्यो का बाहर से सम्पादन करता हुआ भी वह भीतर से कुछ नहीं करता