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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । सप्तानां योगभूमीनामभ्यासः क्रियते कथम् । कीदृशानि च चिह्नानि भूमिकां प्रति योगिनः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

“जाग्रत्येव सुषुप्तस्थः कुरुकमणि राघव“ (हे राघव, जाग्रत्‌ काल में ही सुषुप्ति में स्थित-जैसे होकर आप सभी कर्म करते चलिए) इत्यादि से चतुर्थ भूमिका मेँ आरूढ हुए रामजी को पफवमादिभूमिकाओं मे स्थिति सम्पादन करने की जो सलाह दी गयी है, तदनुसार उन भूमिकाओं में अपनी स्थिति बनाने की इच्छा करते हुए श्रीरामचन्द्रजी अपने से जीत ली गयी या जीती जानेवाली भूमिकाओं का विभाग जानने के लिए उनके लक्षण ओर अभ्यासक्रम को पूछते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, सातो भूमिकाओं का अभ्यास कैसे किया जाता है तथा प्रत्येक भूमिका में योगी के चिह्न किस तरह के होते हैं

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ पचीसवाँ सर्ग समाप्त एक यौ छब्बीसवाँ सर्ग योगभूमिकाओं का अभ्यासक्रम तथा लक्षण, मध्य में मृत्यु हो जाने पर भोग एवं जन्मान्तर में जय आदि का वर्णन ।