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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 12–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 12–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 12-14

संस्कृत श्लोक

तदासौ प्रथमामेकां प्राप्तो भवति भूमिकाम् । मनसा कर्मणा वाचा सज्जनानुपसेवते ॥ १२ ॥ यतः कुतश्चिदानीय ज्ञानशास्त्राण्यवेक्षते । एवंविचारवान्यः स्यात्संसारोत्तारणं प्रति ॥ १३ ॥ स भूमिकावानित्युक्तः शेषः स्वार्थ इति स्मृतः । विचारनाम्नीमितरामागतो योगभूमिकाम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह के गुणों से विशिष्ट पुरुष सतृशास्त्रश्रवणाधिकाररूप प्रथम भूमिका में अवतरित होता है, यह कहते हैं। (>) इस विषय में एक बड़ी अच्छी उक्ति है, सुनिये : “अपि वृन्दावने शून्ये श्रृंगालत्वं स वांछति । न तु निर्विषयं मोक्षं कदाचिदपि गौतम ॥ जिस समय पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है उस समय वह पहली शुभेच्छा नामक एक भूमिका में प्राप्त होता है तथा मन, कर्म एवं वाणी से शान्ति, दान्ति, ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न सज्जन पुरुषों की सेवा करता है । जिस-किसी जगह से उन सज्जनों की सेवा के अनुकूल धन आदि साधन जुटाकर उनकी सेवा करता हुआ वह उनके मुख से ज्ञानदायक शास्त्रं का यानी पुराणों एवं मोक्षधर्म का प्रतिपादन करनेवाली अध्यात्म-संहिताओं का श्रवण करता हे । संसारसागर को तैर जाने के लिए इस तरह के विचार से सम्पन्न जो पुरुष होता है वह प्रथम भूमिका में प्रविष्ट हुआ कहा गया है, किंतु उक्त साधनचतुष्टय आदि सम्पत्ति से जो हीन पुरुष है वह तो अध्यात्मशास्त्रों के अवलोकन मेँ आसक्त होता हुआ भी राग आदि के कारण अनधिकारी पुरुष को ठग-ठग कर उनके द्वारा प्राप्त धनादि से अपना केवल पेट पालन करता है, इसलिए वह वंचक कहा गया है । इसके बाद अधिकार की प्राप्ति होने से वह विचारनामक दूसरी योगभूमिका में अवतीर्ण होता हे