Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 15–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 15–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 15-18
संस्कृत श्लोक
श्रुतिस्मृतिसदाचारधारणाध्यानकर्मणाम् ।
मुख्यया व्याख्यया ख्याताञ्श्रयते श्रेष्ठपण्डितान् ॥ १५ ॥
पदार्थप्रविभागज्ञः कार्याकार्यविनिर्णयम् ।
जानात्यधिगतश्रव्यो गृहं गृहपतिर्यथा ॥ १६ ॥
मदाभिमानमात्सर्यमोहलोभातिशायिताम् ।
बहिरप्याश्रितामीषत्त्यजत्यहिरिव त्वचम् ॥ १७ ॥
इत्थंभूतमतिः शास्त्रगुरुसज्जनसेवनात् ।
सरहस्यमशेषेण यथावदधिगच्छति ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ वह कया करता है, सो बतलाते हैँ ।
उस समय वह श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा, ध्यान और कर्मो में तत्पर रहनेवालों के मध्य
में अध्यात्म शास्त्रों की प्रशस्त व्याख्या करने के कारण जिन्होंने अच्छी ख्याति प्राप्त कर ली है ऐसे
श्रेष्ठ पण्डितो का आश्रय करता है अर्थात् श्रवण-मननादि विचार के लिए आत्मतत्त्व के अनुभव और
उपदेश में अत्यन्त कुशल होने के कारण सर्वश्रेष्ठ गुरुओं की (&) शरण में जाता हे । स्वयं व्याकरण
आदि षडंगों का अच्छा ज्ञाता होने के कारण पदों तथा वाच्यलक्ष्य आदिरूप उनके अर्थो एवं लक्षणा,
व्यंजना आदि उनके विभागों का जिसे खूब ज्ञान हो चुका है - ऐसा विवेकी शिष्य अपने गुरु के मुख
से अध्यात्मशारत्र का श्रवण कर कार्य ओर अकार्य का विनिर्णय तत्त्वतः ऐसे जान लेता हे, जैसे घर
का मालिक अपना घर । लोक मर्यादा के अनुसार बाहर जो कुछ भी थोडी-सी आश्रित मद, अभिमान,
मात्सर्य, मोह ओर लोभ की अधिकता रहती है उसे भी वह उस तरह छोड देता है, जिस तरह साँप
केचुल को । यों पूर्वोक्त सद्रासनाओं से वासित अन्तःकरणवाला वह पुरुष, जो कि दूसरी भूमिका
में पहुँच चुका है, शास्त्र, गुरु ओर सज्जनो की सेवा से पूर्ण परमतत्त्व को अच्छी तरह जान जाता
हे