Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 20–22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 20–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
यथावच्छास्त्रवाक्यार्थे मतिमाधाय निश्चलम् ।
तापसाश्रमविश्रामैरध्यात्मकथनक्रमैः ॥ २० ॥
संसारनिन्दकैस्तद्वद्वैराग्यकरणक्रमैः ।
शिलाशय्यासमासीनो जरयत्यायुराततम् ॥ २१ ॥
वनवासविहारेण चित्तोपशमशोभिना ।
असङ्गसुखसौम्येन कालं नयति नीतिमान् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अध्यात्मविषयक शास्त्रों के अद्वैत आत्मरूप
वाक्यार्थ में (*अहं ब्रह्मास्मि" "तत्वमसि" इत्यादि वाक्यार्थ में) अपनी बुद्धि को निश्चलतापूर्वक स्थापित
कर तपस्वियों के आश्रमं में विश्रामो से, अध्यात्मशास्त्रों की कथाओं के क्रमों से तथा वैसे ही संसार की
निन्दा करनेवाले वैराग्य के साधनक्रमों से पत्थर की चट्टानरूपी शय्या पर आसीन हो अपनी सारी आयु
गँवाता है (७) | चित्त के उपशम से शोभित होनेवाले तथा असंगता के सुख से सोम्य वनवास के विहार
(&) देखिये श्रुति-^ तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।” इत्यादि ।
(७) ये दोनों श्लोक पूर्वभूमिकाओं के अनुवादरूप हैँ ।
से वह नीतिमान् अपने काल को बिताता है, क्योकि गाँव में रहने पर अधिक विक्षेप होने के कारण
समाधि के अभ्यास का भलीभाँति निर्वाह नहीं हो सकता हे