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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

चलार्णवयुगच्छिद्रकूर्मग्रीवाप्रवेशवत् । अनेकजन्मनामन्ते विवेकी जायते पुमान् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

निवृत्त पुरुष का लक्षण कहने की इच्छा रखते हुए महाराज वक्षिष्ठजी निवृत्ति में हेतुरूप विवेक का वर्णन करने के लिए उसकी दुर्लभता बतलाते हैं। जैसे लवणसागर में स्थित बड़े कछुए की गर्दन अनेक बार कण्ठ के छेद में प्रविष्ट होकर उससे बाहर निकलने पर भी लवणसमुद्र के रस का ही आस्वाद लेती तथा उसी को सर्वश्रेष्ठ रस मानती हुई क्षीरसागर के रस को कुछ नहीं जान पाती, किंतु प्रलयकाल के समय क्षार और क्षीर दोनों सागरों के एक जगह मिलने का अवसर आने पर उन दोनों के उदररूपी छिद्र में ग्रीवा का प्रवेश होने पर क्षीर सागर के रस का आस्वाद लेकर “क्षारसागर के रस की अपेक्षा क्षीरसागर का रस कहीं अधिकस्वादयुक्त है" - यों विवेकसम्पन्न होकर वह ग्रीवा उस क्षीरसागर के रस में ही आसक्त हो जाती है; वैसे ही जीव भी पहले विषयरसास्वाद को ही सर्वश्रेष्ठ रसास्वाद मानता हुआ अनेक जन्मों के बाद अंत में भाग्योदय होने पर अध्यात्मशास्त्र के रस का आस्वाद लेकर विवेकी बनकर उसमें आसक्त हो जाता है