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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 5, 6

संस्कृत श्लोक

असारा बत संसारव्यवस्थालं ममैतया । किं कर्मभिः पर्युषितैर्दिनं तैरेव नीयते ॥ ५ ॥ क्रियातिशयनिर्मुक्तं किं स्याद्विश्रमणं परम् । इति निश्चयवान्योऽन्तः स निवृत्त इति स्मृतः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसको किस तरह का विवेक उत्पन्न होता है, यह कहते हैं। अहो, संसार की यह व्यवस्था बिलकुल असार है। इस व्यवस्था से मुझे क्या मतलब है, अनुचित परिणामवाले इन कर्मो से ही मैं अपना दिन क्या गँवाता हूँ क्रियाजनित उत्पत्ति, प्राप्ति और विकृतिरूप संस्कारों से निर्मुक्त (कूटस्थ) परम विश्रान्ति का स्थान कौन हो सकता है ? यों विचारकर जो अपने अन्तःकरण में “मुझे इसका अवश्य सम्पादन करना चाहिए” - इस तरह के निश्चय से युक्त रहता है वह पुरुष निवृत्त कहा गया है