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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

एषा हि परिमृष्टान्तरन्यासां प्रसवैकभूः । द्वितीयां भूमिकां यत्नात्तृतीयां प्राप्नुयात्ततः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

यह समाधि सदाचार से उपवर्धित विवेक-ज्ञान का फल है, यह कहने के लिए विवेक का पद्मरूप से निरूपण करते हैं। सन्तोषरूपी सुगन्ध से मधुर (अथवा सन्तोषजनित हर्ष से मधुर-मकरन्दवाला), उपासना, गुरुशुश्रुषा, श्रवण आदि निष्काम कर्मरूपी निर्मल पल्लवो से युक्त ओर चित्तरूपी नाल के अग्र भाग में संलीन हुए रागादि वासनाओं से उत्पन्न अनेक तरह के विघ्नरूपी कण्टको से संकीर्ण विचाररूपी सूर्य से विकास को प्राप्त हुआ यह विवेकरूपी कमल हृदय में रूढ होकर असंगनामक यह तृतीय भूमिकारूप फल फलता है ॥३६.३७॥ अनेक जन्मो के संचित सुकृतो के परिपाक तथा इस लोक के पुण्यों के संचय से दैववश कहीं पहली भूमिका ही यदि अंकुरित हो गयी, तो बड़े प्रयत्न के साथ सज्जनो की संगति आदि करके उसकी रक्षा करनी चाहिए, क्योकि यदि वह कहीं रक्षित रह गयी तो, फिर वही द्वितीय आदि भूमिकाओं मे अनायास परिणत हो जायेगी, इसलिए उसी की रक्षा मे अधिक यत्न करना चाहिए, यह उपदेश देते है। तत्त्वज्ञानी पुरुषों के समवाय से यानी दान, मान, भजन आदि उपायों के द्वारा सम्मेलन से तथा पुण्यकर्मो के संचय से दैववश कहीं पहली भूमिका उत्पन्न होती है । थोडी सी शुभ प्रवृत्ति में उन्मुख होने के कारण, मेघो से अंकुरित भूमि की नाई, तत्त्वज्ञानियों में अंकुरित उस प्रथम भूमिका की प्रतिदिन विवेकउपदेशरूपी जल के सिंचन से इस तरह प्रयत्नपूर्वक रक्षा ओर पालन करना चाहिए कि वह म्लान न होने पावे। शुभेच्छानामक यह पहली भूमिका चार साधनों के मध्य में वैराम्यरूपी या शान्ति आदिरूपी जिस अंश से सर्वप्रथम अंकुरित होकर उल्लसित होती है उसी अंश को बड़े यत्न के साथ प्रतिदिन अभिवृद्धि में ऐसे पहुँचाना चाहिए, जैसे कृषक धान आदि के अंकुर को अभिवृद्धि में पहुँचाता है ॥ ३ ८-४०॥ अभिवर्द्धित वह एक ही अंश अन्य उत्तर की भूमिकाओं का स्वयं साधन करेगा, यह कहते हैँ । अन्तःकरण में विचार द्वारा उदय को प्राप्त हुई यह पहली भूमिका ही अन्य भूमिकाओं की उत्पत्ति का स्थान बन जाती हे । इसी भूमिका के कारण द्वितीय ओर तृतीय भूमिका को भी यत्न से विवेकी पुरुष प्राप्त कर सकता है