Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 47–51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 47–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 47-51
संस्कृत श्लोक
ततो नश्यति संसार इति शास्त्रार्थसंग्रहः ।
योगभूमिकयोत्क्रान्तजीवितस्य शरीरिणः ॥ ४७ ॥
भूमिकांशानुसारेण क्षीयते पूर्वदुष्कृतम् ।
ततः सुरविमानेषु लोकपालपुरेषु च ॥ ४८ ॥
मेरूपवनकुञ्जेषु रमते रमणीसखः ।
ततः सुकृतसंभारे दुष्कृते च पुरा कृते ॥ ४९ ॥
भोगजाले परिक्षीणे जायन्ते योगिनो भुवि ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे गुप्ते गुणवतां सताम् ॥ ५० ॥
जनित्वा योगमेवैते सेवन्ते योगवासिताः ।
तत्र प्राग्भावनाभ्यस्तयोगभूमिक्रमं बुधाः ।
स्मृत्वा परिपतन्त्युच्चैरुत्तरं भूमिकाक्रमम् ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
द्वितीय प्रश्न का उत्तर देते हैं।
प्रथमादि भूमिकाओं में पहुँचकर अपना जीवन (देह) उत्सर्ग करनेवाले प्राणी का भूमिकाओं के
प्रकर्ष के अनुसार ही पूर्वजन्म का ~ दुष्कृत नष्ट हो जाता हे । तदनन्तर वह योगी देवताओं के विमानों
में, लोकपालों के नगरों मे तथा सुमेरु पर्वत के उपवनं की झाड़ियों मे रमणियों (अप्सराओं) को साथ
लेकर खूब रमण करता है । उसके बाद पूर्व जन्म में किये गये पुण्यो ओर पापों का भोगसमूहों के द्वारा
नाश हो जाने पर वे योगी लोग पवित्र, गुणवान् और लक्ष्मीपात्र सज्जनो के सुरक्षित घर में जन्म लेते है
ओर जन्म लेकर ये लोग योग की वासना से वासित अन्तःकरणवाले होने के कारण योग का ही सेवन
करते हँ । वहाँ पर पूर्वजन्म में की गयी भावनाओं से अभ्यस्त हुए योग भूमिकाओं के क्रम का स्मरण
करके वे बुद्धिमान् लोग आगे के भूमिका क्रम का खूब अभ्यास करने लग जाते हैं