Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 52–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 52,53
संस्कृत श्लोक
भूमिकात्रितयं त्वेतद्राम जाग्रदिति स्मृतम् ।
यथावद्भेदबुद्ध्येदं तज्जाग्रदिति दृश्यते ॥ ५२ ॥
उदेति योगयुक्तानामत्र केवलमार्यता ।
यां दृष्ट्वा मूढबुद्धीनामभ्युदेति मुमुक्षुता ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
दोनो प्रश्नों का उत्तर देकर अव प्रकृत का अनुसरण कर रहे हैं।
हे श्रीरामजी, ये पूर्वोक्त तीनों भूमिकाएँ जाग्रत् कही गयी है, क्योकि इन भूमिकाओं में यथावत्
भेदबुद्धि रहने से यह सम्पूर्ण दृश्यसमूह उस जाग्रत्काल की नाईं ही दिखाई पड़ता है। इन तीनों भूमिकाओं
में योगयुक्त पुरुषों को केवल पूज्यता उदित होती है, जिसे देखकर "यद्यदाचरति श्रेष्ठ: इस न्याय से
मूढबुद्ध पुरुषों को भी मुक्त होने की अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है