Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 86
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 86 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 86
संस्कृत श्लोक
अस्य तूपशमो मोक्ष इत्येवं ज्ञानसंग्रहः ।
प्रसादकारिणी स्वच्छा निरिच्छे विमलाकृतौ ॥ ८६ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णारूपी संसार का नाश ही मोक्षभूमिका के उदय में हेतु होने से मोक्ष है, भूमिकाओं के उदय में
वैराग्य कारण कैसे है, इसको दिखलाते हैँ ।
पुरुषों के राग आदि अपराध से मलिन हुए मन में श्रुतियों के अनुकूल आचार्य आदि का उपदेश,
कमल के पत्तों के ऊपर जलबिन्दु की नाई, तनिक भी नहीं जमता, लेकिन वैराग्य आदि साधनों से
सम्पन्न इच्छारहित विमल आकृतिवाले पुरुष में स्वयं निर्मल अतः दूसरे का चित्त प्रसन्न करने में
कारणरूप गुरुउपदेशवाक्य, दर्पण में तैलबिन्दु की नाई, संक्रान्त हो जाता है खूब जम जाता है