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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 87–88

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 87–88 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 87,88

संस्कृत श्लोक

तैलबिन्दुरिवादर्शे विश्राम्यत्युपदेशवाक् । असंवेदनमात्रेण नोदेतीच्छाभवाङ्कुरः ॥ ८७ ॥ मनागभ्युदितैवेच्छा छेत्तव्यानर्थकारिणी । असंवेदनशस्त्रेण विषस्येवाङ्कुरावली ॥ ८८ ॥

हिन्दी अर्थ

राग आदि की उत्पत्ति न होने में तथा उत्पन्न हुए राग आदि के छेदन मे उपाय वतलाते है । एकमात्र विषयों की स्मृति का परित्याग कर देने से इच्छारूपी संसार का अंकुर उत्पन्न नहीं होता। विषवृक्ष के अंकुरों की पंक्ति - जैसी अनेक तरह का अनर्थ पैदा करनेवाली, इस इच्छा को तनिक भी बढते ही विषयों के विस्मरणरूप शस्त्र से काट देना चाहिए, इच्छा से व्याप्त हुआ जीव अपने वांछित अर्थ की सिद्धि के लिए दीनता को कभी नहीं छोड सकता