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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 89–90

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 89–90 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 89,90

संस्कृत श्लोक

इच्छाविच्छुरितो जीवो विजहाति न दीनताम् । स्वसंवेदनयत्नस्तु तूष्णीमेवान्तरासनम् ॥ ८९ ॥ अवधानविनिर्मुक्तं सुप्तं शवशतं यथा । तां प्रत्याहारबडिशेनेच्छामत्सीं नियच्छत ॥ ९० ॥

हिन्दी अर्थ

असंवेदन के स्वरूप का व्युत्पादन करते हैँ । सुन्दर असंवेदन में यानी उत्तमरूप से विषयों का स्मरण न होने में श्रेष्ठ प्रयत्न यही है कि चित्त अपने भीतर समस्त व्यापारो से निर्मुक्त होकर अवधानशून्य सोये हुए सैकड़ों मृतकों की नाई बैठा रहे । हे श्रीरामजी, अनर्थ पैदा करनेवाली उस इच्छारूप मछली को आप सब लोग प्रत्याहाररूपी बंसी में फँसाकर बाँध रखिये