Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 93
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 93 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 93
संस्कृत श्लोक
अनुभूतां नानुभूतां स्मृतिं विस्मृत्य काष्ठवत् ।
सर्वमेवाशु विस्मृत्य गूढस्तिष्ठ महामतिः ॥ ९३ ॥
हिन्दी अर्थ
अनुभूत ओर अननुभूत सब तरह की स्मृति का शीघ्र ही विस्मरण कर काष्ठ के समान मूढ एवं
महामति होकर स्थित रहिये