Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 94
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 94 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 94
संस्कृत श्लोक
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति तत् ।
असंकल्पः परं श्रेयः स किमन्तर्न भाव्यते ॥ ९४ ॥
हिन्दी अर्थ
सभी प्राणियों को विषय संकल्पो के त्याग के बिना मोक्ष की सिद्धि नहीं होती, इसलिए उनका त्याग
अवश्य कर देना चाहिए, इस अपने समस्त उपदेश रहस्य को अब परम कारुणिक महाराज वसिष्ठजी
चिल्लाकर दृढ़ करने की अभिलाषा से कहते हैं।
मैं ऊपर हाथ उठाकर बार-बार ऊँचे स्वर से चिल्लाकर यह कह रहा हूँ, लेकिन कोई उसे सुनता
नहीं कि संकल्पत्याग ही परम श्रेय का सम्पादक है, उसकी भावना तुम लोग अपने हृदय में क्यों नहीं
करते