Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 95
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 95 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 95
संस्कृत श्लोक
किल तूष्णीं स्थितेनैव तत्पदं प्राप्यते परम् ।
परमं यत्र साम्राज्यमपि राम तृणायते ॥ ९५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, यह श्रुतियों से (&) उक्त और लोक में भी प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण इन्द्रियो ओर
मन के व्यापारों को छोड़कर केवल चुपचाप बैठा हुआ ही पुरुष उस परम पद को प्राप्त करता है, जिस
भूमानन्दरूप परम पद में हिरण्यगर्भ तक का भी साम्राज्य तृण की नाई तुच्छ बन जाता है