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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 96

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 96 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 96

संस्कृत श्लोक

गम्यदेशैकनिष्ठस्य यथा पान्थस्य पादयोः । स्पन्दो विगतसंकल्पस्तथा स्पन्दः स्वकर्मसु ॥ ९६ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वथा संकल्पत्याग होने पर देहादि-स्पन्दन के अभाव से व्यवहार का लोप हो जाने पर कैसे जीवन रह सकता है, यदि ऐसी कोई आशंका करे, तो उस पर कहते हैं। अपने गन्तव्यस्थान (गृह आदि) की ओर जाने के लिए अविच्छिन्न चित्तवृत्तिधारा से युक्त पथिक के पैर में जैसे बिना संकल्प के ही स्पन्दन प्रतिक्षण होते रहते हैं यानी उस पथिक के पैर अपने अभीष्ट स्थान की ओर जाने के लिए बे-रोक-टोक उठते जाते हैं, वैसे ही योगी के भी पूर्वजन्म में किये गये अभ्यासरूपी अदृष्ट के वश से ही अनिषिद्ध अपने कर्मो में स्पन्दन होता रहेगा