Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
प्रपञ्चविषया वृत्तिर्जाग्रन्निद्रेति कीर्तिता ।
संप्रबुद्धस्तु यस्यान्तश्चित्प्रदीपो निरञ्जनः ॥ १३ ॥
शून्यमूलः प्रपञ्चोऽयं शून्यताशिखरः सखे ।
सारशून्यतया मध्येऽप्यनास्था सन्मनीषिणाम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
सबसे पहले प्रणव की प्रथम मात्रा से बोधित होनेवाला जगत्प्रपंच का मिथ्यापन, उसके साक्षी का
विवेक करने के लिए, सिद्ध करते है।
प्रपच को ग्रहण करनेवाला जो जाग्रत व्यापार है, उसको निद्रा ही कहते हैं और जिसके भीतर
चैतन्य दीपक प्रकाशित रहता है, उसे निरंजन (साक्षी) कहते हैं । हे मित्र, यह जो प्रपंच है, इसका
मूल कारण झूठा अज्ञान ही है ओर अन्त भी झूठा अज्ञान ही हे । मध्यकाल में भी विचारने पर इसकी
कोई सत्ता न होने के कारण केवल प्रतीति ही रहती है, अतः उत्तम विद्वान् इसमें किसी तरह की
आस्था नहीं करते