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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 15–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

अनादिवासनादोषादसन्नेवायमीक्ष्यते । गन्धर्वनगराकारः संसारो बहुविभ्रमः ॥ १५ ॥ त्वमनभ्यस्य कल्याणीं चैतन्यामृतकन्दलीम् । संमुह्यसि किमध्यास्य वासनाविषवीरुधः ॥ १६ ॥ जाग्रदेतन्न पतितं ज्ञानालम्बग्रहादधः । न सन्त्युपरि सर्वेषां ये निरालम्बसंविदः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जो वस्तु असत्‌ रहती है, वह भी अनादि वासनायुक्त अविद्या से, गन्धर्वनगर के सदश, दिखलाई पड़ती है, यह कहते हैं। अनादि वासना के दोष से असत्‌ यह संसार दिखलाई देता है, उसका गन्धर्वनगर के सदुश मिथ्यास्वरूप है। यह अनेकविध भ्रमं से भरा पड़ा है। भद्र, तुम चैतन्यरूप अमृतकन्दली का अभ्यास न कर वासनारूपी विषवल्ली का आश्रय कर क्यों व्यर्थ मोह में फँसे हो ? जब तत्त्वज्ञान हो जाता है, तब स्पष्ट हो जाता है कि पहले यानी चित्त की स्थिरता के हेतु ज्ञानरूपी आलम्बन का आश्रय करने के पहले भी यह जाग्रत जगत्‌ था ही नहीं और ऊपर की चतुर्थ अवस्था में भी जाग्रत आदि कुछ है नहीं । यह विषय उन सभी योगियों के अनुभव से सिद्ध है, जो सर्वस्वतन्त्र आत्मज्ञान से परिपूर्ण हैं