Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
तावद्रूढा सुधाकाररसा संविन्महानदी ।
न यावदात्मरूपेण निपुणैरवगाह्यते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक अज्ञान रहता है, तभी तक चितिरूपी नदी में जगत्-रूपी तरंगों का उद्भव होता रहता
है, यह कहते हैं।
सुधास्वरूप रस से परिपूर्ण चितिरूपी महानदी तभी तक जगत्तरंगों से युक्त रहती है, जब तक
उसमें आत्मरूप से प्रवेश नहीं किया जाता यानी मुख्य आत्मज्ञान नहीं होता