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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

स खलु परमयोगी विश्ववन्द्यः सुरेशो जननमरणहीनः शुद्धबोधस्वभावः । सकलगुणनिधानं संनिधानं रमायास्त्रिजगदुदयरक्षानुग्रहाणामधीशः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जितना उपदेश रामजी ने सुना उतना तुमने भी तो सुना, यदि तुम्हें सन्देह की निवृत्ति हुई है, तो उन्हें भी सन्देह की निवृत्ति हो गयी। यदि नहीं हुई है तो उन्हें भी नहीं हुई, यों तुम स्वयं ही क्यो नहीं जान लेते, इस आशंका पर भरद्वाजजी अपने में और श्रीरामभद्र में महान्‌ अन्तर बतलाते हैं। असल में श्रीरामभद्र तो महान्‌ योगी, सबके वन्द्य, देवों के स्वामी, जनम-मरण से रहित, विशुद्ध ज्ञानमय, समस्त गुणों की खान, समस्त रेश्वर्यो के आधार तथा तीनों लोकों के उत्पादन, रक्षण एवं अनुग्रह आदि में सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र थे। वे केवल लोगों पर अनुग्रह के लिए ज्ञानशास्त्र की प्रवृत्ति करने के उद्देश्य से स्वेच्छा से ही अपने अज्ञान की कल्पना कर श्रवणार्थ प्रवृत्त हुए, मैं तो आरम्भ से ही अज्ञानी हूँ, मुमुक्षु हूँ और मेरे पास साधनों की भी कमी है, अतः हम दोनों मे महान्‌ अन्तर है, यह तात्पर्य हे