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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

भरद्वाज उवाच । इति वरमुनिनोक्तं ज्ञानसारं पुराणं सकलमनुनिशम्य श्रीरघूणां कुलाग्र्यः । विमलमतिरपृच्छत्किंचिदन्यत्स्वयं वा समसुखपरिपूर्णः पूर्णबोधस्थितोऽसौ ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

यहाँ तक श्रीवसिष्ठ मुनि ओर श्रीरामजी का परस्पर संवाद हुआ उसे सुनाकर वाल्मीकि मुनि रामजी की विश्रान्ति का स्मरण कर स्वयं आप भी पूणनिन्द आत्मा में विश्रान्त हो गये । उस समय वे बिलकुल चुपचाप हो गये थे। इस प्रकार की अपने गुरु की स्थिति देखकर भरद्वाज, परमानन्द में अपनी स्थिति न पाकर, आगे और कुछ सुनने की इच्छा से पूछते हैं। भरद्वाज ने कहा : हे गुरो, रघुकुल में सर्वश्रेष्ठ, विशुद्धमति श्रीरामभद्र ने अपने गुरु महाराज वसिष्ठजी के द्वारा अनेक प्रकारों से उपदिष्ट इस अतिप्राचीन (आदिम ब्रह्मा से लेकर महर्षियों के सम्प्रदाय में चले आ रहे) ज्ञानरूपी सार का श्रवणकर क्या और भी कुछ जिज्ञासु होकर पूछा था या वे उतने ही उपदेश से सम्पूर्ण सन्देहों से रहित एवं तारतम्यशून्य प्रत्यक्ष अनुभूत आत्मसुख से परिपूर्ण होकर पूर्णज्ञानरूप आत्मा बनकर स्थित हो गये, यह मुझसे कहिए

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ खब्बीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग रामजी की विश्रान्ति, भरद्वाज मुनि की उत्कण्ठापूर्वक उक्तियाँ, जाग्रत्‌ आदि अवस्थाओं के लक्षण तथा तुरीय पद ~ इनका वर्णन ।