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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 102

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verse 102 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 102

संस्कृत श्लोक

अहंममेति संविदन्न दुःखतो विमुच्यते । असंविदन्विमुच्यते यदीप्सितं समाचर ॥ १०२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, अहं,” “मम” (यह मैं हूँ, यह मेरा है) यह भावना कर रहा पुरुष दुःख से छुटकारा नहीं पाता तथा “अहं” “मम” यह भावना न कर रहा पुरुष मुक्त हो जाता है, अब आपको जो अच्छा लगे वही कीजिये