Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अप्रतर्क्यात्प्रतीकारात्किमेवमवसीदसि ।
न लुम्पति ललाटस्थामीश्वरोऽप्यक्षरावलिम् ॥ ४० ॥
क्व चिद्वक्ता क्व वैदग्ध्यं क्व चेयं मोहवल्लरी ।
अचिन्तनीया नियतिर्यदियं द्वन्द्वमाहिता ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो भगवान् महेश्वर की उपासना ही करनी चाहिए, यम, नियम, ज्ञान आदि की कोई आवश्यकता
नहीं है, ऐसी आशंका होने पर कहते हैं।
सखे, ईश्वर की शरण में गये हुए भी तुम पुरुष के तर्को से अगम्य तथा एकमात्र श्रुति से गम्य
धर्मादिसहित ज्ञानरूप प्रतीकार से यानी मूलसहित सम्पूर्ण कर्मों के निरासोपाय से क्यों उद्विग्न हो रहे
हो, क्योकि उपासना द्वारा प्रसन्न किया गया ईश्वर भी ललाट के ऊपर लिखे गये अक्षरों को अपने हाथ
से स्वयं नहीं मिटा सकता, किंतु ज्ञानकृत मूलोच्छेदोपाय से ही मिटा सकता है