Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
हे भरद्वाज मोहं त्वं विवेकेन जहि स्फुटम् ।
असामान्यमिदानीं त्वं ज्ञानं प्राप्स्यस्यसंशयम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
गुरु और शास्त्रों में शिष्य को बोध दिलाने की शक्ति, शिष्य में चित्त की शुद्धि द्वारा ऊहापोह
में अधिक कुशलता के कारण समझने की शक्ति तथा रागादि में मूल सहित उखड़ जाने की
योग्यतारूप परिपाक आदि सब सामग्रियों का मिलना भी ईश्वर की इच्छारूप नियति के वश ही रहता
है, इसे कहते हैं ।
कहाँ तो वाणी और मन के अगम्य अखण्ड ब्रह्मात्मचिति को बतलानेवाला गुरु, कहाँ उसके जानने
की योग्यतारूप शिष्य का कौशल और कहाँ शम, दम आदि के क्रम से अपने सर्वनाश के लिए परिणत
यह मोहरूप वल्लरी ? परंतु जिसके प्रभाव से यह सारी सामग्री परस्पर एक दूसरे में मिल गयी है, वह
ईश्वर की इच्छा अचिन्तनीय है ॥४ १॥
इसलिए ऐसी सामग्री उपलब्ध होने पर मोह को जीत लेने के लिए खूब उत्साह रखना ही युक्त है,
बीच में आकर शोक करना ठीक नहीं, इसे कहते हैं।
हे भरद्वाज, तुम अपने विवेक से इस मोह का स्पष्टरूप से त्याग कर दो, फिर तो निःसन्देह तुम
असाधारण ज्ञान को प्राप्त कर लोगे