Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 43–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
दूरमुत्सहते राजा महासत्त्वो महापदि ।
अल्पसत्त्वो जनः शोचत्यल्पेऽपि हि परिक्षते ॥ ४३ ॥
बोधः पुण्यपराधीनः प्रथते बहुजन्मभिः ।
अनुमीयेत धीरेषु जीवन्मुक्तेषु कार्यतः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
किसी बड़े कार्य में सामग्रीहीन पुरुष को ही शोक करना उचित है, महाराजो की नाई सर्वस्म्पन्न
तुम्हें शोक करना तो ठीक नहीं, इस आशय से कहते हैं।
महाशक्ति सम्पन्न राजा युद्ध आदि महाविपत्तियों में फस जाने पर भी धन, नौकर आदि सामग्रियों
से सम्पन्न होने के कारण दूसरों के लिए अतर्कित भी पृथिवी परिपालन, दुष्टनिग्रह, शिष्टपरिपालन
आदि कार्य केवल अज्ञान से ही करने में समर्थ होता है, किंतु अल्पशक्ति सम्पन्न पुरुष तो धनादिक्षतिरूप
साधारण एक छोटी-सी आपत्ति आ जाने पर भी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर शोक करने लगता है क्योकि
उसे पार करने में धैर्य आदि सामग्रीरूप हेतु उसके पास नहीं रहता