Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
द्विषद्भूतेन येनैव कर्मणा बन्ध ईदृशः ।
सुहृद्भूतेन तेनैव मोक्षमाप्स्यसि पुत्रक ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवन्मुक्त पुरुषों को दृष्टान्त बनाकर पुण्य-सामग्री रहने पर मुझे बोध अवश्य ही हो जायेगा, यह
अनुमान करके सबसे पहले पुण्य कमाने में मनुष्य को प्रवृत्त होना चाहिए, इस आशय से कहते हैं।
भगवान् महेश्वर की दया से अनेक जन्मों के बाद आत्मज्ञान प्रकट होता है, यह आत्मज्ञान मुझे भी
सामग्री रहने पर अवश्य होगा, ऐसा प्रत्येक पुरुष को अनुमान कर लेना चाहिए, क्योकि यहाँ जीवन्मुक्त
धीर पुरुषो में अनेक जन्मों के संचित पुण्य से आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ देखा जाता है, यह दृष्टान्त है ॥ ४ ४॥
पाप के समान पुण्य भी संसारवन्धन का कारण है, अतः शत्रुस्वरूप हुआ पुण्य क्यों कमाया जाय ?
इस आशंका पर कहते है ।
हे पुत्र, विषयों में अनुराग होने पर शत्रुस्वरूप हुए जिस पुण्यकर्म से तुम्हें इस तरह का बन्धन प्राप्त
हुआ है, विषयों में अनुराग न होने पर मित्रस्वरूप हुए उसी पुण्यकर्म से तुम मोक्ष पा जाओगे