Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
न विशेषग्रहः कश्चिन्न च कश्चिन्न कश्चन ।
जन्तुष्वभ्यवहार्येषु प्राक्रम्य कालभोगिनः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दूसरे प्राणियों के शरीर आदि का काल भोजन कर डालता है वैसे ही अपने शरीर आदि का भी
काल भोजन कर डालता है, इस नियम को मानकर यह निश्चय कर लेना चाहिए कि जो जिसका खाद्य
है, उसे वह अवश्य ही खा लेगा । जब इस तरह का निश्चय हो जाता है, तब शरीर आदि में से
अहन्ताभिमान का भी परित्याग हो जाता है और तदनन्तर शोक का प्रसंग नहीं आता, यह कहते हैं।
हे भद्र, केवल कालरूप सर्प द्वारा बलपूर्वक आक्रमण कर भक्षित किये जानेवाले जन्तुओं के
बीच में वास्तव में न कोई विशेष ज्ञान हे, न कोई ऐसे ज्ञान का विषय विशेषरूप धर्म है ओर न कोई
ऐसे धर्म का आश्रय (धर्मी) ही है