Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
संहृतिस्थितिसंभूतिभेदैर्योऽनेकधा स्थितः ।
एकोऽपि सन्नमस्तस्मै सच्चिदानन्दमूर्तये ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् का लय करने में हेतुभूत अपवाद कहने की इच्छा से अध्यारोप द्वारा अनेक प्रकार से स्थित
एक ही मंगलरूप देव को नमस्कार करते हैं।
जो देव वास्तव में एक होता हुआ भी अध्यारोप द्वारा उत्पत्ति, स्थिति और संहाररूप कार्यो से
अनेक प्रकार का होकर स्थित है, उस सच्चिदानन्दरूप परमात्मा को नमस्कार है