Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 58–61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 58–61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 58-61
संस्कृत श्लोक
देवद्विजगुरुश्रद्धाभरबन्धुरचेतसाम् ।
सदागमप्रमाणानां महेशानुग्रहो भवेत् ॥ ५८ ॥
भरद्वाज उवाच ।
ज्ञातं तव प्रसादेन सर्वमेतदशेषतः ।
न वैराग्यात्परो बन्धुर्न संसारात्परो रिपुः ॥ ५९ ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि वसिष्ठेनोपपादितम् ।
ज्ञानसारमशेषेण ग्रन्थेनोक्तं पदात्मना ॥ ६० ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
भरद्वाज श्रृणुष्वेदं महाज्ञानं विमुक्तिदम् ।
यस्य श्रवणमात्रेण भवाब्धौ न निमज्जसि ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
जो मंगलमय वस्तु हैं, उन्हें बतलाते हैं।
जो पुरुष देव, द्विज ओर गुरुओं के ऊपर परिपूर्ण श्रद्धा रखकर निर्मल चित्तवाले हो गये हैं और
जो वेदादि सत्-शास्त्रों में प्रमाण्यबुद्धि रखते हैं ऐसे पुरुषों के ऊपर महेश्वर का परम अनुग्रह होता
है अर्थात् देव, द्विज आदि के ऊपर श्रद्धा आदि रखने से ईश्वरानुग्रहरूप परम मंगल प्राप्त होता है,
इसलिए देवादि में श्रद्धा आदि ईश्वरानुग्रहरूप मंगल के साधन होने से मंगलरूप हैं और ईश्वरानुग्रह
साक्षात् ज्ञान का साधन होने से उनसे भी बढ़कर मंगलरूप है । भरद्वाज ने कहा : भगवन्, आपके
प्रसाद से मैंने पूर्णरूप से सब साधनों का रहस्य यह जान लिया कि वैराग्य से बढ़कर दूसरा इस
संसार में उद्धार करनेवाला बन्धु नहीं है और संसार से बढ़कर दूसरा मारनेवाला कोई शत्रु नहीं है।
अब मैं अनेक वाक्यरूप समस्त ग्रन्थ से महाराज वसिष्ठजी द्वारा कहे गये ज्ञानरूपी रहस्य का
सम्पूर्ण निचोड़ थोड़े शब्दों में सुनना चाहता हूँ, कृपाकर कहिए । वाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्वाज,
मुक्ति देनेवाले इस महाज्ञान को तुम सुनो, इसके केवल सुनने से ही फिर संसाररूपी सागर में तुम
गोते नहीं लगाओगे