Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 55–57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 55–57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 55-57
संस्कृत श्लोक
स्वयं नृत्यसि किं प्रीतो विपत्तौ विकलेन्द्रियः ।
क्षणं निश्चलमासीनः पश्य संसारनाटकम् ॥ ५५ ॥
अस्यानेकतरङ्गस्य जगतः क्षणभङ्गिनः ।
न विषीदति मनस्वी भरद्वाज मनागपि ॥ ५६ ॥
त्यज शोकममङ्गल्यं मङ्गलानि विचिन्तय ।
चिदानन्दघनं स्वच्छमात्मानं च विभावय ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
वास्तव में तुम साक्षीरूप ही हो, इसलिए तुम्हें दूर से केवल संसारलृत्य का कौतुक ही देखना
चाहिए, न कि शोक, मोह आदि विकारो से विकृत होकर स्वयं नृत्य करना चाहिए, यह कहते है ।
भद्र, धन नाश आदि विपत्तियं मेँ विकृत इन्द्रियों से युक्त होकर प्रेमपूर्वक क्यों स्वयं ही नृत्य करने
लग जाते हो, क्षणभर चुपचाप बैठकर संसारनाटक तो देखो । हे भरद्वाज, अनेक रंगों से युक्त इस
जगत् को क्षणभंगुर देखकर ज्ञानी पुरुष तनिक भी शोक नहीं करता | अमंगल देनेवाले शोक को छोड़
दो, मंगलमय वस्तुओं का विचार करो और चिदानन्दघन स्वच्छ परमात्मा की भावना करो