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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 14, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

रत्नगैरिककान्तेन तेजसा वह्निवर्चसा । मध्वासवरसेनेव रञ्जयत्ककुभां गणम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

वह शिखर मधुर आसव से जनित मद की नाईं अग्नि के सदृश वर्चस्व रखने वाले पद्मराग आदि रत्न एवं गेरुमिश्रित सुवर्ण धातुओं के कमनीय तेज से दिशारूपी रमणियों को रक्तिम बना रहा था