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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 14, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

गर्जज्जीमूतमुरजं भूभृतानां तु मण्डपम् । हसत्कुसुमगुच्छाढ्यं ध्वनत्षट्पदपेटकम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ मेघरूप मृदंग आदि वाद्य बज रहे थे, वह वनभूमि से पुष्ट हुई वन-लक्षिमयों का एक तरह से नृत्य-मंडप था, खिले हुए पुष्पगुच्छों से परिपूर्ण था और भ्रमर-समूहों से गुंजित था