Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 14, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
दन्ततालदलावल्या परिहासादिव स्फुरत् ।
दोलालोलाप्सरोवृन्दमुदारमदमन्मथम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह परिहास से विकसित हो रही दन्तपंक्तियों के
सदृश विकसित ताल पत्रों की पंक्तियों से अत्यन्त सुहावना लगता था। वहाँ झूलों पर झूल रहीं चंचल
अप्सरा थीं और सभी प्राणियों का उन्माद और अभिलाषाएँ नवीनरूपता धारण किये हुई थीं, वहाँ की
शिलाओं पर देवता विश्रान्ति ले रहे थे, उसकी गुफाओं का देवताओं के जोड़ों ने आश्रय किया था