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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 14, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

गन्धर्वगीतसुभगमामोदमधुरानिलम् । फुल्लहेमाम्बुजोत्तंसं तारारत्नविभूषितम् । व्योम्नः पारमिव प्राप्तं पिङ्गलं मैरवं शिरः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, आकाश में ऊँचाई की परम सीमास्वरूप उस प्रकार के पीले वर्ण के उस मेरुपर्वत के सिर पर मैं पहुँचा, वह तारारूपी रत्नों से विभूषित ओर विकसित स्वर्णकमलरूपी कर्णपूर से रमणीय था