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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । कुसुमापूर्णकल्पाभ्रकुन्तले तस्य मूर्धनि । कल्पाङ्गमहमद्राक्षं शाखाचक्रमिव स्थितम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सा) देखा