Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
पुष्परेण्वभ्रवलितं रत्नस्तबकदन्तुरम् ।
उत्सेधनिर्जिताकाशं शृङ्गे शृङ्गमिवार्पितम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, चारों ओर से वह वृक्ष फूलों के परागों से धूसरित था, वह रत्नसदृश पुष्प-
गुच्छों से दन्तुर था, उसने अपनी ऊँचाई से आकाश को मात कर दिया था, वह पूर्ववर्णित मेरशिखर
के ऊपर रखे हुए दूसरे शिखर के सदृश प्रतीत होता था