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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

ताराद्विगुणपुष्पौघं मेघद्विगुणपल्लवम् । रश्मिद्विगुणरेण्वभ्रं तडिद्द्विगुणमञ्जरीम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

उसने केवल अपनी ऊँचाई से ही आकाश को मात नहीं कर दिया था, किन्तु तारा आदि मिलाकर द्रियुणित पुष्प आदि धारण करने के कारण भी उसने आकाश को मात कर दिया था, यों कहते हैं। उसने ताराओं को मिलाकर द्विगुणित पुष्प धारण किये थे, मेघरूप पल्‍लवों को मिलाकर द्विगुणित पल्लव धारण किये थे, किरणों को मिलाकर द्विगुणित पुष्परेणुरूप मेघ धारण किये थे बिजली को मिलाकर द्विगुणित मंजरियाँ धारण की थीं