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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

स्कन्धेषु किन्नरीगीतद्विगुणभ्रमरस्वनम् । दोलालोलाप्सरोलोकद्विगुणीकृतपल्लवम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ शाखा-प्रदेश में किन्नर युवतियों के गीतों को लेकर द्विगुणित भ्रमरों की गुंजार ध्वनि हो रही थी, उसने झूलों पर आरूढ़ चंचल अप्सराओं के होठ, हाथ एवं पदरूप पल्लवो को लेकर दूने पल्लव धारण किये थे