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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

सिद्धगन्धर्वसंघातद्विगुणोत्थविहंगमम् । रत्नकान्त्यच्छनीहारद्विगुणत्वग्वृतांशुकम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

वांछितरूपों को धारण करने की शक्ति से संपन्न होने के कारण स्वच्छन्द विहार करने के लिए कल्पित विहंगम वेषवाले सिद्धों एवं गन्धर्वो के समूहों को मिलाकर द्विगुण विहंगम उस पर विद्यमान थे, उसने रत्नकान्ति के सदृश स्वच्छ हिमकणों को लेकर दूने हुए त्वचारूपी वर्त्र पहने थे